एकलव्य: आधुनिक संदर्भ में
श्रीमती दीप्ति गोस्वामी1, डाॅ. आभा तिवारी2
1शोधार्थी, दूधाधारी बजरंग महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)
2प्राचार्य, शासकीय चन्द्रपाल डडसेना महाविद्यालय, पिथौरा (छत्तीसगढ़)
शिवशंकर पटनायक छत्तीसगढ़ के उन गिने चुने साहित्याकारों में से है, जिनके साहित्य में समाज के प्रति सजगता दिखाई देती है। पटनायक जी के उपन्यासों की पृष्ठभूमि भले ही पुरातन परिदृश्य को अंकित करती है, पर उस पुरातन में छिपा नवीनता का संकेत चिंतन को नया आयाम प्रदान करता है। उन्होनें अपने उपन्यासों की पृष्ठभूमि महाभारत से ली है, पर उनमें संदर्भ आज के हंै, समस्यायें और इन समस्याओं के समाधान के सूत्र संकेत इनके उपन्यासों को एक बड़ा पाठक वर्ग प्रदान करते हंै। आलोच्य उपन्यास एकलव्य की कथावस्तु महाभारत कालीन है, इस कथा के माध्यम से लेखक ने जिन प्रसंगो को उठाया है वे आज भी प्रासंगिक हंै। चाहे शिक्षा का प्रश्न हो या नारी अस्मिता का प्रश्न, ये कुछ ऐसे बिन्दु हैं जो आज भी अपनी पूर्णता की तलाश कर रहे हैं नारी सम्मान का प्रश्न पहले भी विद्यमान था और आज भी है।
शिवशंकर पटनायक छत्तीसगढ़ के उन गिने चुने साहित्याकारों में से है, जिनके साहित्य में समाज के प्रति सजगता दिखाई देती है। पटनायक जी के उपन्यासों की पृष्ठभूमि भले ही पुरातन परिदृश्य को अंकित करती है, पर उस पुरातन में छिपा नवीनता का संकेत चिंतन को नया आयाम प्रदान करता है। उन्होनें अपने उपन्यासों की पृष्ठभूमि महाभारत से ली है, पर उनमें संदर्भ आज के हंै, समस्यायें और इन समस्याओं के समाधान के सूत्र संकेत इनके उपन्यासों को एक बड़ा पाठक वर्ग प्रदान करते हंै।
आलोच्य उपन्यास एकलव्य की कथावस्तु महाभारत कालीन है, इस कथा के माध्यम से लेखक ने जिन प्रसंगो को उठाया है वे आज भी प्रासंगिक हंै। चाहे शिक्षा का प्रश्न हो या नारी अस्मिता का प्रश्न, ये कुछ ऐसे बिन्दु हैं जो आज भी अपनी पूर्णता की तलाश कर रहे हैं नारी सम्मान का प्रश्न पहले भी विद्यमान था और आज भी है। एकलव्य मेें भी यह प्रश्न उठा है, पर लेखक ने उत्तर भी दिया है। नारी की अस्मिता के हनन का अधिकार किसी को भी नहीं है, चाहे वह राजा हो या प्रजा। इसीलिए हस्तिनापुर के राजा चित्रांगद द्वारा वनकन्या का अपमान किये जाने पर सभी वनवासी उसके लिए मृत्युदण्ड का माँग करते हैं ’’हस्तिनापुर ही क्या किसी भी राज्य के राजा हो जाने से नारी अथवा कन्या की अस्मिता से खिलवाड़ करने अथवा बल प्रयोग कर शीलहरण करने के प्रयास की स्वीकृति नहीं मिल जाती, हम वनवासी हैं। हमें न तो वैभव चाहिए न धन हमारे लिए हमारा वनधर्म ही सब कुछ है। तुमने कन्या का शीलहरण करने का प्रयास किया है अतः वनवासी समाज में तुम्हे मृत्युदण्ड ही दिया जायेगा।’’1
कालांतर में पुलिंद के सैनिकों ने भी यही कृत्य करने का प्रयास किया और वे केतकी एवं एकलव्य द्वारा या तो मारे गये या घायल हो गये। एकलव्य अपनी पत्नी केतकी की सहायता से पुलिंद के सैनिकोें द्वारा बल पुर्वक बंदी बनाई गई वनकन्याओं को छुड़ाकर ससम्मान विंध्यपर्वत तक पहुँचाता है। वनकन्याँ एवं स्त्रियाँ अपनी सुरक्षा स्वयं कर सके
इसके लिए केतकी उन्हें शस्त्रों की शिक्षा देती है इस प्रकार लेखक नारी अस्मिता की रक्षा के लिए चिंतित हैं। समाज के ऐसे वहशियों को मृत्युदण्ड दिये जाने में लेखक का आक्रोश व्यक्त हुआ है। यह भी सही है कि नारी को अपनी सुरक्षा के लिए शस्त्रविद्या में पारंगत होना पड़ेगा। वन्य संस्कृति के माध्यम से एक सराहनीय पहल ने एक दिशा प्रदान की है इसमें संदेह नहीं।
भारतीय संस्कृति में शिक्षा का महत्व अनादिकाल से रहा हैै। पहले शिक्षा का क्षेत्र वर्ग विशेष तक सीमित था। इस कारण एक आदिवासी वनपुत्र होने के कारण एकलव्य को शिक्षा प्राप्त करने के लिए अत्यंत संघर्ष करना पड़ा। वन पुत्र होने के कारण राजकुमारों के साथ शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार एकलव्य को नहीं था। एकलव्य द्रोणाचार्य का शिष्यत्व ग्रहण करना चाहता है, पर द्रोण राजगुरू हैं, और उनका शिक्षा आश्रम राज्याश्रित है एवं राजकुमार यह नहीं चाहते कि एक आदिवासी वनपुत्र उनके साथ शिक्षा ग्रहण करे। अतः उसे इस अधिकार से वंचित कर दिया जाता हैै। क्या आज भी तथाकथित शिक्षा संस्थानों में यही स्थिति नहीं है ? होनहार प्रतिभाएँ उच्च शिक्षा से मात्र इसीलिए वंचित रह जाती हैं, क्योंकि उन संस्थानों की शर्तोें को पूरा नहीं कर पाती ।
एकलव्य ने मृदा प्रतिमा के समक्ष निरंतर कठोर अभ्यास कर धनुविद्या में अर्जुन से भी अधिक निपुणता हासिल की। यह आज भी युवा पीढ़ी के लिए मानो संदेश है कि दृढ़ इच्छा शक्ति और सिखने की चाह सामान्य मनुष्य को भी विशेष बना देती है। एकलव्य ने यह दृढ़ संकल्प लिया था कि किसी भी स्थिति में वह धनुर्विद्या में पारंगत होगा ही और उसे आशातीत परिणाम भी प्राप्त हुए एकलव्य ने न सिर्फ स्वयं शिक्षा प्राप्त की बल्कि पूरे वनवासी समाज को शिक्षित किया एकलव्य की पत्नी केतकी ने वनस्त्रियों एवं वनकन्याओं को शिक्षित करने में अपनी सहभागिता निभाई यह है स्त्रियों का पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना एवं समाज के उत्थान में सक्रिय योगदान देना।
बड़ांे के प्रति आदर सम्मान हम आज विस्मृत कर बैठे हैं। समाज की इस मूल्यहीनता की ओर भी लेखक का ध्यान जगह-जगह पर केन्द्रित हुआ है, गुरु के प्रति जो सम्मान शिष्य में होना चाहिए वह आज लुप्त प्राय है। इसके लिए आज भी एकलव्य की गुरुभक्ति का उदाहरण दिया जा सकता है।
गुरु द्रोणाचार्य की घृष्टधुम्न के द्वारा निर्मम हत्या कर दिये जाने पर एकलव्य अत्यंत विचलित हो उठा, उसे शांत कराने के लिए भगवान श्री कृष्ण को अपना दिव्य रूप दिखाना पड़ा और कहना पड़ा ’’नहीं नहीं भीलकुमार एकलव्य मैं तुम्हारी मानसिक स्थिति से परिचित हूँ तथा जानता हूँ कि वनवासी परंपरा और संस्कार के अनुसार गुरु की क्या महत्ता होती है मुझे हर्ष है कि नगरीय सभ्यता में जहाँ मानवीय मूल्य संवेदना श्रद्धा तथा बन्धुत्व की अनुभुतियों को विस्मृत कर दिया है वहाँ ये सब आज भी वनवासियों के लिए महत्वपूर्ण है। एकलव्य मैं पुनः कहता हूँ कि तुम्हारी भक्ति सदैव के लिए अनुकरणीय प्रसंग होगी ।’’2
शिवशंकर पटनायक ने वन्य संस्कृति के चित्रण के माध्यम से पशुप्रेम, वनसंरक्षण आदि को भी उजागर किया है। वस्तुतः यह पर्यावरण के संरक्षण की लेखकीय चिंता है। पर्यावरण की सुरक्षा आज के परिवेश में कितनी महत्वपूर्ण है यह हम सभी भलिभांति जानते हैं। पर पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति आदिवासी समाज जितना सजग है उतना आज का सभ्य समाज नहीं यह कहने में संकोच नहीं। आदिवासी जंगलो में रहकर वनसम्पदा से अपना जीवन यापन करते हैं। भौतिकता की उन्हें चाह नहीं। आदिवासी समाज में यह नीति थी कि किसी भी पशु का वध तब तक नहीं होगा जब तक जीवन रक्षा के लिए आवश्यक न हो। पाण्डवों के कुत्ते के भोंकने से जब एकलव्य के अभ्यास में विघ्न उत्पन्न हुआ तब एकलव्य ने कुत्ते के मुख को बाणों से बंद कर दिया, पर मुख से एक बूंद भी रक्त नहीं बहा, अर्जुन ने इसका प्रतिवाद किया एकलव्य और अर्जुन के विवाद को शांत करने के लिए ’’युधिष्ठिर’’ ने 20 हिरनों की माॅँग की। पर एकलव्य इंकार कर देता है, ’’मैं विवश हूँ राजकुमार न मैं हिरण दूँगा और न ही आखेट करने दूँगा।’’3 साहित्यकार ने इस उपन्यास में एकलव्य को आदिवासी समाज के मुखिया के रूप में जिस प्रकार चित्रित किया है वह अत्यंत सराहनीय है। वन में रहने वाले वनवासियों को हिंसक पशुओं से खतरे की संभावना हो सकती थी पर उन्हें खतरा हुआ भी तो मनुष्योें से। इससे यह प्रमाणित होता है कि आज मानव पशुओं के समान बर्बर और हिंसक हो गया है। यह किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
उपन्यास में वनवासियों की वनसंबंधी व्यवस्था के प्रति चिंतन के रूप में उनके अंतस की पीड़ा को अभिव्यक्ति देकर साहित्यकार ने जैसे प्रश्न किया है कि मानव जाति को वर्ण व्यवस्था के तहत् चार वर्ण ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शुद्र रूप में विभक्त किया गया है। किन्तु वनवासी को तो किसी भी वर्ग में सम्मिलित नहीं किया गया है। क्या अपने मानव होने के लिए भी कोई प्रमाण प्रस्तुत करना होगा ? समाज मेें उनकी नागरिकता भी निम्न दर्जे की है। उपन्यास में एकलव्य के माध्यम से साहित्यकार ने उनकी इस पीड़ा को अभिव्यक्ति दी हैं साथ ही उनमें एक वैचारिक क्रांति का सूत्रपात भी किया है।
’’वनवासी शिक्षा से वंचित है अतः ब्राम्हण नहीं हो सकते व्यवसाय नहीं करते अतः वैश्य नहीं हो सकते, ब्राम्हण, क्षत्रिय एवं वैश्य की सेवा नहीं करते तो शुद्र नहीं हो सकते किन्तु क्षत्रिय की तरह वह शस्त्र तो चलाते हंै भले ही भाला या धनुषबाण ही क्यों न हो तथा वीरकर्म तो करते हैं, अतः क्षत्रिय क्यो नहीं हो सकते ?’’4 यह प्रश्न उनके अंतर मन को हमेशा कचोटता रहता था।
अभिजात्य वर्ग ने तो आदिवासी समाज को दोयम दर्जे का बना दिया था। परन्तु प्रकृति ने उन्हें सम्पूर्ण कलाओं से युक्त किया। आदिवासी समाज उस स्वर्ण अयस्क के समान था जिसे गलाने के लिए उस सुनार की अवश्यकता थी जो उन्हे समझता, परखता और संवारता। इस प्रकार इस उपन्यास में पटनायक जी ने ऐसे वर्ग का चित्रण किया है जो सभ्य समाज में अपना अस्तित्व बनाने के लिए छटपटा रहा है। उपन्यासकार ने जनजाति समाज की दयनीय स्थिति का वर्णन बहुत ही प्रभावपूर्ण ढंग से किया है साथ वनवासियों के सर्वमान्य एवं सांस्कृतिक विचारों को भी एक नई दिशा दी है। रचनाकार ने एकलव्य के माध्यम से उसकाल की वनवासी परम्परा, नीति, रीति, आचार-विचार, व्यवहार एवं नारी अस्मिता के प्रति सम्मान को इतने अद्भूत रूप में प्रस्तुत किया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल के अभिजात्य वर्ग की संस्कृति से कहीं अधिक उत्तम वन संस्कृति थी। इस उपन्यास के माध्यम से रचनाकार ने निराशा में उत्साह का संचार किया है। जो संघर्ष जनजाति समाज अपने को बनाये रखने के लिए, जीवन मूल्यों को बचाने के लिए कर सकता है। वह हम क्यों नहीं कर सकते ?
साहित्यकार ने जिस उपेक्षित व्यक्ति को उपन्यास का नायक बनाया है, उसका व्यक्तित्व अनेक गुणों से युक्त है। उसका संपूर्ण जीवन शिक्षाप्रद हैं। एकलव्य ने संकल्प लिया धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त करने का पर उसका दुरूपयोग नहीं किया बल्कि वनवासियों को शिक्षित कर उन्हें संगठित किया और यह बता दिया कि यदि व्यक्ति ठान ले तो क्या नहीं कर सकता। उसने संकल्प लिया वनवासियों को अभिजात्य वर्ग में सम्मानपूर्ण स्थान दिलाने का वर्णभेद मिटाने का और मानवीय मूल्यों की रक्षा का और इसे पूरा भी किया। इसी कारण वह दुर्योधन के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता। प्रशिक्षित वनवासियों को सेना में नहीं भेजता क्योंकि उसने शपथ ली थी कि वे शस्त्रों का तब तक प्रयोग नहीं करेंगेे जब तक कोई उनके सम्मान, स्वाभीमान, सांस्कृतिक परम्परा तथा अस्तित्व पर आघात न करें। ’’क्योंकि शांति की स्थापना हेतु युद्ध किये जाते हैं किन्तु युद्ध से शांति की स्थापना अनिवार्य नहीं है यह भी संभाव्य है कि एक युद्ध दूसरे अनागत युद्धों की नींव डाल दंे।’’5
वस्तुतः इस उपन्यास के माध्यम से शिवशंकर पटनायक ने एक ऐसे नायक को चुना जो गुणों से युक्त है पर जिसे उपेक्षित कर दिया गया है। यह कृति अपने आप में बहुत से प्रश्नों के समाधान समेटे हुए हैं। इस प्रकार एकलव्य शिवशंकर पटनायक का एक अद्वितीय उपन्यास है जिसका आधुनिक संदर्भ में विशेष महत्व है।
संदर्भ
1. पटनायक शिवशंकर ,एकलव्य, पृष्ठ 19
2. पटनायक शिवशंकर ,एकलव्य, पृष्ठ 251
3. पटनायक शिवशंकर, एकलव्य, पृष्ठ 109
4. पटनायक शिवशंकर, एकलव्य, पृष्ठ 21
5. अवस्थी प्रमिला, हिन्दी रामकाव्य, पृष्ठ 149
Received on 19.08.2016 Modified on 08.09.2016
Accepted on 20.09.2016 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 4(3): July- Sept., 2016; Page 139-142